रात

फ़िर वही पल खटकती फिर वही बात
अनशन पर है दिन और भूखी है रात

केतली की चाय भी अब फीकी सी लगती है
सूरज निकल आता है पर ढलती नहीं रात

कुछेक पल तो काट लेते है रात से गुफ्तगू में
औरों का दिन तो चढ़ जाता है यहाँ चढ़ती नहीं रात
-ब्लेंक राइटर

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